Wednesday, September 4, 2019

जान पड़ती हो

दूर से आती तुम, लहर जान पड़ती हो
ज़ुल्फ़ कानों पर ठहरा कसम, ज़हर जान पड़ती हो

तेज़ मगर शीतल सी सहर जान पड़ती हो
रुक सके हर मुसाफ़िर वो ठहर जान पड़ती हो

धड़ल्ले से लिखी कोई बहर जान पड़ती हो
साँझ और रात बीच फँसी पहर जान पड़ती हो

गुस्से में तौबा खुदा की कहर जान पड़ती हो
नेमत हुई दरगाह की कोई मेहर जान पड़ती हो

गांव को लिए बसी सुदूर शहर जान पड़ती हो
मिट्टी में आसमान घुला नहर जान पड़ती हो

दूर से आती तुम लहर जान पड़ती हो
ज़ुल्फ़ कानों पर ठहरा कसम, ज़हर जान पड़ती हो ...

सहर : सुबह

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