Wednesday, September 11, 2019

संडे का ख़्याल

एक लड़का अपने सोने को तय संडे से
अक़्सर कुछ वक़्त निकाल कर
ठीक उस समय जब सूरज
अपना शिफ़्ट ख़त्म करके
छुट्टी की तैयारी में लगा होता है

हाँ ठीक उस वक़्त जब परिंदे
दिन भर की खानाबदोशी समाप्त कर
घर की ओर लौट रहे होते हैं

बिल्कुल उस वक़्त ही
जब सारा शहर अपनी अपनी छत पर
कुछ पल संडे को घेर कर रोक लेना चाहता हैं

ठीक उसी वक़्त वो भी अपनी छत पर
बिल्कुल अकेले, वो छोटी दीवार पर हाथ टेके
सोचता और मुस्कुराता है
बालों में पीछे की ओर हाथ फेरता हुआ

के इस वक़्त अगर उसकी "वो" साथ होती
तो वो ये करता , वो करता, ऐसा करता, वैसा करता
इन बातों पर हँसता, इन बातों पर रूठता

वगैरह वगैरह ....


©roshi
शायरीमित्र

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