Friday, September 27, 2019

सुबह उस एक शाम की

मुंबई का एक सामान्य रविवार सप्ताह के अन्य दिनों की तरह ही अस्त व्यस्त रहता है, आप काम करते हैं या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जीशान, सीमा और दयाल, ये आपस में ना ही पड़ोसी हैं, ना ही रिश्तेदार और ना ही इनका आपस में कोई खूनी या गैर खूनी संबंध ही है, फिर भी इन तीनों के पास एक ही किताब है अलग-अलग बुक कवर, अध्याय और शीर्षकों के साथ पढ़ने और पूरा करने के लिए।
जीशान, एक 21 वर्षीय ग्रेजुएट है, जो एक अच्छी नौकरी पाने की कोशिश कर रहा है। मुंबई में एक अच्छी नौकरी का मतलब है 10k वेतन और जीवन की सभी गरिमाओं का कम जीवन होना।
सीमा एक 27 वर्षीय तलाकशुदा महिला है, उसके पति या यूँ कहें उसके तथाकथित पति ने उसे एक बड़ेे "खाली" घर और कभी ना खत्म होने वालेे बैंक बैलेंस के साथ छोड़ दिया। उसके पास उसके बच्चे भी नहीं, जो उसे परेशां कर सकें।
दयाल एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी है। उसकी पत्नी ने कई साल पहले उस वक़्त उसका साथ छोड़ दिया, जब उसका बेटा घर से बिना कुछ लिए यूँ ही छोड़ के जा रहा था।
सुबह से लेकर रात तक इन तीनों के पास एक काम समान था, वह था बीते कल जैसेे, आज जैसेे एक और कल का यूँ ही इंतज़ार करना ।
वे तीनों एक ही चीज़ के लिए भटक रहे थे, लेकिन कई अलग-अलग तरीकों से।
जीशान की सुबह हमेशा उसके हाथों में एक बायोडाटा के साथ शुरू होती है और रात भी ठीक कुछ वैसे ही उसी बायोडाटा को सिराहने रख बंद हो जाती है । वह हमेशा खुद को उसी एक सड़क की, उसी एक बस में और कई मौकों पर एक ही बिल्डिंग में यात्रा करता पाता है।
उसे पता ही नहीं क‍ि वह कहाँ और कैसे उन ग्रेड्स को 'जो उसने अपने स्कूल और कॉलेज के वर्षों में प्राप्त किये थे' को एक औपचारिक पोशाक के साथ बदल सकता है । वह एक सड़क के किनारे पर अपने सभी डिग्री और प्रतिशत का प्रदर्शन करने की सोच रहा था, ताकि वह एक वेतन के रूप में कोई ध्यान जुटा सके ।
उसके ऊपर अपने घर की ऐसी कोई जिम्मेदारी नहीं थी, लेकिन इन दिनों वह बहुत भारी था ।
उस रविवार उसके हाथ में उसका बायोडेटा नहीं था, उसने शायद अपने बायोडाटा से एक दिन का ब्रेकअप लिया था ।
उसने समुद्र के किनारे जा के टहलने का निर्णय किया। वो जगह, जो सबसे भीड़भाड़, मगर सबसे शांत इलाका है।
सीमा, उसे कोई रोकने वाला नहीं था, ना ही कोई जगाने वाला था और ना ही कोई उसे ये बतलाता था क‍ि उसे क्या करना है, कैसे करना है, क्या पहनना, कैसे बात करनी है, किससे बात करनी है और भी सब ब्ला ब्ला ।
वो एक बगैर दूल्हे के सवारी वाली घोड़ी थी, जो लगाम छुड़ाना भी चाहती थी और थमाना भी ।
वह कहीं भी बाहर ही जाना चाहती थी, लेकिन वह जानती थी कि अगर वह घर पर रुकी तो ये घर उसे धीरे धीरे बिना डकार लिए ही पचा जाएगा ।
उसकी सुबह एक गैर परिचित सी सुबह है, हर दफा वही तय करती है क‍ि उसके हिस्से का सूरज आसमान चढ़ चुुका है या नहीं ।
वह अपने जाने पहचाने इलाकों में घूमना पसंद नहीं करती, पता नहीं क्यों?
वह सिर्फ दिन भर ड्राइविंग करती रहना ही पसंद करती है, हाँ कभी रुकना भी पसंद है उसे, मगर वह कहाँ रुके, ये वो कभी तय ही नहीं कर पाती थी ।
उस रविवार को वह हमेशा की तरह गाड़ी चला रही थी और मुंबई की हर सड़क पर टायर के निशान छोड़ने के बाद उसने खुद को मरीन ड्राइव में शादीशुदा जिंदगी का एक पल रिलीव करने के लिए राजी कर लिया।
दयाल के पास पूूरे दिन करने को कुछ भी नहीं था, वह एक ऐसा बूढ़ा आदमी था, जो हर कॉलोनी के हर बच्चे को चाहिए होता है ।
वह हमेशा गेंदों और शोर पर भौंह चढाने की कोशिश करता था, मगर हर बार ही बुरी तरह विफल रहता था ।
वह खुद को मिले एक अतिरिक्त दिन का खुदा के सामने कभी भी शुक्रगुज़ार नहीं हुआ करता था ।
वह हमेशा अपनी दाहिनी जेब में हथेली के आकार की अपनी पत्नी की एक तस्वीर रखता था ।
हमेशा ही दो कप चाय तैयार किया करता था और एक के बाद एक दोनों को खत्म करता था ।
ये रविवार उसके लिए भी कोई खास नहीं था, उसने खुद को अनलॉक करने का फैसला किया और कुछ शांति और अपनी पत्नी के पसंदीदा "रेत की भूनी छल्ली (भुट्टा)" के लिए समुद्र के किनारे की सोची ।
हालांकि वह बुढ़ापे के मजबूत दांतों के कारण इसे खा नहीं सकता था, मगर फिर भी।
सूर्य कभी ना खत्म होने वाले समुद्र में डुबकी लगाने की कोशिश कर रहा था।
सारी मुंबई उस एक स्थान पर थी, मगर ये तीनों बिलकुल ही अकेले थे ।
जीशान धीमे धीमे टहल ही रहा था क‍ि अचानक ही उसे एक धीमी, अस्पष्ट सी आवाज़ सुनाई पड़ी, जो शायद मदद की गुहार में थी ।
वह उस दिशा में बेतहाशा भागा, समुद्र के उस एक हिस्से में दुनिया भर की भीड़ समा सकती थी, मगर आज वहां कोई भी नहीं था । जैसे ही वह वहां पहुंचा, उसने देखा कि एक बूढ़ा व्यक्ति एक महिला को अरब की ज़्यादा गहरी नहीं, मगर डुबाने की क्षमता रखने वाली गहराई से खींचने की कोशिश कर रहा था। वह मदद के लिए दौड़ा। उसे यकीन नहीं था कि वह उन्हें बचाने में सक्षम भी होगा या नहीं या वह शायद खुद को भी बचाने में सक्षम होगा या नहीं, क्योंकि वह तैराकी में इतना अच्छा नहीं था और उसे ऊँची उठती लहरों का बहुत खौफ था । लेकिन वह बिना सोचे समझे ही मदद को लपक पड़ा ।
उस 5-7 मिनट की हाथापाई में, लहरों के पास निगलने को सब कुछ था, चीख, पुकार, साँसें, रोज़ मर्रा की उलझन, मगर जो एकलौती चीज़ वहाँ डूब रही थी, वह था "डर" ।
दयाल ने कठिन परिस्थितियों में किसी के द्वारा पकड़े नहीं जाने के अपने डर को डूबते देखा।
जीशान की पकड़ में उसे उसी पकड़ की परछाई नज़र आई, जो उसे उस वक़्त चाहिए थी, जब वह सब कुछ खो रहा था । दयाल की मदद करने वाला जीशान शायद आखिरी व्यक्ति होगा, लेकिन यह उसके लिए पर्याप्त से कहीं अधिक था। उसकी पत्नी की तस्वीर उससे बहुत दूर बह रही थी, लेकिन वह बिल्कुल भी चिंतित नहीं था, क्योंकि वह जानता था कि वह अभी भी उसके सीने के ऊपरी बाईं तरफ कहीं है।
सीमा को किसी तरह "सिंदूर", "चूड़ियाँ", "बिंदी" और "मंगलसूत्र" के रूप में उसके डूबने का डर देखने को मिला। वह अपने पूरे जीवन में जिस चीज़ के लिए भाग रही थी, ताकि कोई उसकी चिंता करे या उसके बारे में सोचे। लेकिन अब उसके पास दयाल और जीशान थे, जो उसके जीने और मरने की चिंता कर रहे थे। वह जानती थी कि उसे जीवन भर यह एहसान नहीं मिलने वाला, लेकिन वह यह सोचकर खुश थी कि यह सुखद वाली चीनी का एक दाना उसके बाकी बचे चींटी के आकार के चाह लिए पर्याप्त होने वाला है।
और जीशान जिसने असफलता को इतने लंबे समय तक अपने जीवन साथी के रूप में देखा था, जितनी भी उम्र व्यतीत की थी उसने । उसकी नाकामयाबी का डर उनकी आंखों के ठीक सामने बुलबुला रहा था। उसके रोज़ वाली सभी सड़कें, बसें और इमारतें जिनसे वो द्र करता था आज उसके आँखों के सामने 2005 की बाढ़ का सामना कर रहे थे। उसे अब अपने सर्टिफिकेट्स को लॉकर के भीतर संभाले रखने का तरीका आ चुुका था । वह अब बे-इस्तेमाल ग्रेड्स के बारे में चिंता किए बिना ही खुद को सफलता का मौका दे सकता था।
उस रविवार का डूबता सूरज रोज़ सा ही एक 6 से 6 का सूरज था और रोज़ सा ही अपने को डुबोते हुए एक शाम का शंखनाद कर रहा था, लेकिन इन तीनों के लिए यह शाम 'सुबह थी उस एक शाम की' ।

Wednesday, September 11, 2019

ख़्वाहिश

My First Ever Poetry 
Written on 18th Feb 2015 
The First 2 lines came when I was returning from my Income Tax Tuition Class .
( तब क्या पता था ये पागलपन यहाँ तक ले आएगा 😁 )

It wasn't all Sudden
कुमार विश्वास जी का एक गीत 
"होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो"
सुना था 
फिर वहाँ जा पहुँचा जहाँ से बग़ैर दीवाना हुए कोई नहीं लौटता 
" कोई दीवाना कहता है , कोई पागल समझता है "
फ़िर पगली लड़की वो रचना रही उनकी 
जिससे मैंने अपनी ख़ातिर एक पगली लड़की दिल में बसा रखी है
ऐसे ही सिलसिले के बाद ये कविता अचानक फूट पड़ी थी उस वक़्त 😁😁

*ख़्वाहिश*

यूँ कर तू ऐसी ख्वाहिश, कि न कर उसकी फरमाईश
यूँ कर तू ऐसी ख्वाहिश, कि न कर उसकी फरमाईश 

है जिस दरगाह की तलाश मे तू दर-बदर
पा लेगा उसे बस कर थोड़ा सबर
यूँ तो लाखों तमन्नाएँ है अधूरी
थोड़ा तो दम लगा कर दिखा पूरी

चाहे तू दूनियाँ, ये है तेरी हसरत
पाने को है कुछ खोना, तो खो आपनी नफ़रत
हो राजा की ख्वाहिशें या रंक की तमन्ना
अपनी-अपनी अदा से सभी ने है बुना

तू ना सोच क्या तेरा और क्या तूझसे
तोड़ दे हर हद-सरहद अपनी जुस्तजू से
उस महताब की ही तरह कर अपने इश्क की नुमाईश
ना कर फरमाइश, छीन ले, ये है तेरी जागीर पैदाइश

बस कुछ ऐसी हो तेरी ख्वाहिश, न कर फरमाइश
बस यही हो तेरी ख्वाहिश, बस यही हो तेरी ख्वाहिश ...
©roshi

संडे का ख़्याल

एक लड़का अपने सोने को तय संडे से
अक़्सर कुछ वक़्त निकाल कर
ठीक उस समय जब सूरज
अपना शिफ़्ट ख़त्म करके
छुट्टी की तैयारी में लगा होता है

हाँ ठीक उस वक़्त जब परिंदे
दिन भर की खानाबदोशी समाप्त कर
घर की ओर लौट रहे होते हैं

बिल्कुल उस वक़्त ही
जब सारा शहर अपनी अपनी छत पर
कुछ पल संडे को घेर कर रोक लेना चाहता हैं

ठीक उसी वक़्त वो भी अपनी छत पर
बिल्कुल अकेले, वो छोटी दीवार पर हाथ टेके
सोचता और मुस्कुराता है
बालों में पीछे की ओर हाथ फेरता हुआ

के इस वक़्त अगर उसकी "वो" साथ होती
तो वो ये करता , वो करता, ऐसा करता, वैसा करता
इन बातों पर हँसता, इन बातों पर रूठता

वगैरह वगैरह ....


©roshi
शायरीमित्र

Wednesday, September 4, 2019

जान पड़ती हो

दूर से आती तुम, लहर जान पड़ती हो
ज़ुल्फ़ कानों पर ठहरा कसम, ज़हर जान पड़ती हो

तेज़ मगर शीतल सी सहर जान पड़ती हो
रुक सके हर मुसाफ़िर वो ठहर जान पड़ती हो

धड़ल्ले से लिखी कोई बहर जान पड़ती हो
साँझ और रात बीच फँसी पहर जान पड़ती हो

गुस्से में तौबा खुदा की कहर जान पड़ती हो
नेमत हुई दरगाह की कोई मेहर जान पड़ती हो

गांव को लिए बसी सुदूर शहर जान पड़ती हो
मिट्टी में आसमान घुला नहर जान पड़ती हो

दूर से आती तुम लहर जान पड़ती हो
ज़ुल्फ़ कानों पर ठहरा कसम, ज़हर जान पड़ती हो ...

सहर : सुबह

सुबह उस एक शाम की

मुंबई का एक सामान्य रविवार सप्ताह के अन्य दिनों की तरह ही अस्त व्यस्त रहता है, आप काम करते हैं या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जीशान, स...